BARABANKI NEWS.... मशहूर शायर साहिर लुधियानवी का शेर है... जिस अफसाने को अंजाम तक पहुंचाना न हो मुमकिन... उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा... जिले में सपा-कांग्रेस की दोस्ती पर ये शेर एकदम सटीक बैठ रहा है। दरअसल फरवरी की मध्यम सर्द में इंडिया गठबंधन बनने के बाद से शुरू हुई दोस्ती की ये कहानी मौसम की तपिश और चुनावी सरगर्मियों के साथ खूब परवान चढ़ी। शुरूआती म़ॉनसून तक भी ये दोस्ती दर्ज-ए-हरारत कम नहीं था, लेकिन बीच बरसात अचानक जिले में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में दूरियों की खाईं बढ़ने लगी। अब जिले में सपा और कांग्रेस नेताओं की वीरू-जय जैसी दोस्ती नजर नहीं आ रही है। वजह शायद वही है कि... जिस अफसाने को अंजाम तक पहुंचाना न हो मुमकिन....
दरअसल बाराबंकी समाजवादियों का गढ़ रहा है। देश के दूसरे ही चुनाव से यहां से कांग्रेस को समाजवादियों से बड़ी चुनौती मिलती रही है। जिस दौर में कांग्रेस का दबदबा पूरे मुल्क में हुआ करता था। उस वक्त बीच-बीच में समाजवादी विचारधारा वाली पार्टियां कांग्रेस को पटखनी देकर चौंकाती रही हैं। 1989 के बाद तो जिले में कांग्रेस का वनवास खत्म होने में 30 साल लगे। इन तीन दशक में समाजवादी किला इतना मजबूत हो गया था कि कांग्रेस का नामो निशान नहीं बचा था, लेकिन 2009 में समाजवादी विचारधार के बड़े नेता बेनी प्रसाद वर्मा अपने पुराने साथी को छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए और उनके जनाधार का फायदा उठाकर कांग्रेस ने यहां फिर अपना खाता खोला। 2014 और 2019 की मोदी लहर में यहां बीजेपी ने बाजी मारी। 2014 और 2019 में कांग्रेस नेता पीएल पुनिया हार के बावजूद यहां कांग्रेस की बंजर जमीन को खाद पानी देते रहे। 2024 में जब समाजवादी पार्टी को अपना बेस वोट खिसकता नजर आया, तो गठबंधन मजबूरी में जरूरी हो गया। गठबंधन के तहत बाराबंकी की संसदीय सीट कांग्रेस के खाते में चली गई। गठबंधन के बाद दोस्ती परवान चढ़ी और कांग्रेस उम्मीदवारों ने उम्मीद से उलट बड़ी जीत हासिल करके सबको चौंका दिया। जीत के बाद इस कामयाबी के क्रेडिट लेने के लिए सपाइयों ने खूब कोशिश की। भले ही ये जीत कांग्रेस उम्मीदवार के बेहतरीन चुनावी प्रबंधन, उनकी छवि और मेहनत की वजह से रही हो, लेकिन दूसरी पार्टी के नेताओं ने अपनी मेहनत का हवाला देकर बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बनने की खूब कोशिश की। जीत के बाद शहर को हरे-लाल होर्डिंग्स पर कांग्रेस सांसद की तस्वीरों से पाट दिया गया। होर्डिंग पर जोशिली शेर-ओ-शायरी से कार्यकर्ताओं का जोश देखते ही बनता था। कुछ दिनों तक तो साथ में उठना, साथ में बैठना, साथ में खाने-पीने का दौरा भी काफी दिनों तक चला, लेकिन जैसे-जैसे वक्त गुजरा दोस्ती की डेनसिटी कम होती चली गई।
दोस्ती में दूरी की एक वजह व्यस्तता हो सकती है। ये भी मुमकिन नहीं है कि हर कोई, हर वक्त साथ-साथ चल सके, लेकिन इन वाजिब वजहों के अलावा दूरी की अहम वजह सियासी है। दरअसल मौजूदा माहौल में कांग्रेस की जीत ने बाराबंकी में उसे बरगद की तरह बना दिया है। कांग्रेस बाराबंकी में खेल बनाने की हालत में तो है ही, साथ ही खेल बिगाड़ने की ताकत उसमें जिले में तो कम से कम आ गई है। ऐसे में सबसे ज्यादा दिक्कत यहां समाजवादी पार्टी के लिए खड़ी होने वाली है। चर्चा है कि अगर सपा-कांग्रेस का गठबंधन 2027 में भी रहा, तो कांग्रेस जिले में कम से कम दो 2 सीटों की मांग कर सकती है। ऐसे में सपा के दो दिग्गजों को चुनावी मैदान से दूर होना पड़ेगा। चर्चाएं तो यहां तक की है कि कांग्रेस कुर्सी विधानसभा के साथ एक सुरक्षित सीट अपने लिए मांग सकती है। कुर्सी में तो कांग्रेस के एक दिग्गज नेता ने अपना चुनावी अभियान भी शुरू कर दिया है। कुर्सी विधानसभा की कुर्सी के लिए सपा के अंदर पहले से घमासान है। बताया जा रहा है कि सपा के एक मौजूदा विधायक पहले से ही चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। ऐसे में कुर्सी का घमासान सुलझान गठबंधन के लिए ही नहीं, समाजवादी पार्टी के लिए बड़ी चुनौती होगी। सपा-कांग्रेस में गठबंधन हो गया तो गठबंधन जिले में छक्का मारने की स्थिति में जरूर होगा।
वहीं अगर गठबंधन न हुआ, तो कांग्रेस कितनी सीट जीत पाएगी ये कहना, तो जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना जरूर है कि वो सबसे ज्यादा खेल सपा का ही बिगाड़ेगी। क्यूंकि भले ही विकल्प की कमी में समाजवादी पार्टी को पिछड़ों और मुस्लिमों का पूरा वोट मिला हो, लेकिन विधानसभा चुनाव में स्थितियां पहले जैसी ही रहें, ये मुमकिन हो इसकी गारंटी किसकी है। शायद यही वजह है कि जिस अफसाने को अंजाम तक पहुंचाना न हो मुमकिन... उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा...
BARABANKI NEWS.
CONGRESS
SAMAJWADI PARTY
ALLIANCE
SAMAJWADI PARTY
ALLIANCE

0 टिप्पणियाँ